# # निराला और उनका अल्हड़पन!
एक कवि की तंगहाली से चिंतित होकर , कोई प्रधानमंत्री का उसे आर्थिक मदद देने की बात सुझाते हुए खत लिखना # # निराला और उनका अल्हड़पन ! छठें दशक की बात है. इलाहाबाद का कॉफी हाउस उन दिनों साहित्यकारों और समाजवादियों का गढ़ हुआ करता था. डॉ. लोहिया इलाहाबाद आए हुए थे. कॉफी हाउस में नौजवानों के साथ बैठकी कर रहे थे. अचानक से बोले , चलो निराला से मिलने चलते हैं. साथ में विजयदेव नारायण साही थे. बोले “अगर उन्होंने भगा दिया तो मुझे दोष न देना.” डॉ. साहब ने कहा “तब की तब सोचेंगे.” निराला दारागंज में रहते थे. अभी लोहिया आधी दूर ही पहुंचे होंगे कि बोले “चलो वापस चलते हैं.” साही जी चौंक गए. पूछा- क्यों ? जवाब मिला- कह दिया तो चलो. लौटकर आए तो बोले उनकी कुछ रचनाएं मुझे पढ़ने को दो. कुछ पढ़कर चलना ठीक रहेगा. रात भर लोहिया ने निराला को पढ़ा. अगले दिन मिलने गए. पहुंचे तो साही जी ने कहा निराला जी , डॉ. लोहिया आपसे मिलने आए हैं. मुझसे क्यों मिलने आए हैं ? जवाहरलाल तो कभी नहीं आए. मैं लोहिया हूं. वो जवाहरलाल हैं. मैं तुम्हें जवाहरलाल के बराबर मानता हूं. अंगीठी जल रही थी. बोले- आ...