मानवता का राज्याभिषेक


आवो मिलकर मानवता का राज्याभिषेक करते हैं !!

वर्षों से सामान्य स्थिति को उसकी चरम सीमा तक दुरुपयोग किया जाता रहा है । आज वैसी ही स्थिति 
है जैसे कि एक रस्सी को इतना खींच दिया गया हो कि वह किसी पक्षी की ज़रा सी चोंच मारने से ही टूट
जाए। अब चूँकि रस्सी टूट चुकी है तो क्या हम इसके टूटे सिरों को फिर से बाँध दें या फिर इस टूटी 
रस्सी के बल पूरी तरह से खोलकर देखें कि हम उससे क्या नया बुन सकते हैं?

कोविड-19 हमें यह दिखा रहा है कि जब मानवता किसी एक उद्देश्य के लिए एक साथ आ जाती है तो आश्चर्यजनक तीव्र गति से परिवर्तन संभव हो सकते हैं। संसार की किसी भी समस्या का हल असलियत में कठिन नहीं है लेकिन हमारे बीच असहमतियों के कारण उनका हल ढूँढना कठिन हो जाता है। सामंजस्यता में, मानवता की रचनात्मक शक्ति असीम होती है।

कुछ महीने पहले तक हमने क्या क्या नहीं किया - व्यावसायिक उड़ान हों या यात्रायें, ताली हों या थाली बजाना, सभी अकल्पनीय थे और मूर्खतापूर्ण लगता था. कोविड का संकट यह दर्शाता है कि जब हम वास्तव में किसी महत्वपूर्ण चीज़ के लिए सहमत हो जाते हैं तो हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति में कितना बल हो सकता है। योजनाबद्ध सहमति में हम और क्या प्राप्त कर सकते हैं? हम क्या पाना चाहते हैं और कैसा समाज बनाना चाहते हैं? जब भी किसी की आत्मशक्ति जागृत होती है तो अगला प्रश्न यही उठता है। जिस ‘सामान्य स्थिति’ की हमें लत लग गई थी उसकी पकड़ से निकलने के लिए कोविड-19 एक पुनर्वास व्यवस्था की तरह है। जब हम किसी आदत में अवरोध पैदा करते हैं तब हम उस पर चिंतन करते हैं। उसे अनिवार्यता से बदलकर चयन की स्थिति में लाते हैं। जब संकट कम हो जाएगा तब शायद हमें स्वयं से यह पूछने का अवसर मिले कि क्या हम अपनी पहले वाली सामान्य स्थिति की ओर लौटना चाहेंगे या फिर हमने अपनी दिनचर्या में आए इस बदलाव में कुछ ऐसा पाया है जिसे शायद हम भविष्य में अपनाना चाहेंगे। अब, जबकि इतने लोग अपनी नौकरियाँ खो चुके हैं तो शायद हम पूछें कि क्या सचमुच वे सभी ऐसे काम हैं जिनकी संसार को सबसे ज़्यादा कोविड-19 हमें यह दिखा रहा है कि जब मानवता किसी एक उद्देश्य के लिए एकसाथ आ जाती है तो आश्चर्यजनक तीव्र गति से परिवर्तन संभव हो सकते हैं , ज़रूरत है या हमारे श्रम और रचनात्मकता का इससे बेहतर उपयोग हो सकता है। इतने समय तक इन सब के बिना रहने के बाद शायद हम पूछें कि क्या हमें सचमुच इतनी हवाई यात्राओं की, या डिज़्नी-वर्ल्ड में छुट्टियाँ मनाने की आवश्यकता है? अर्थव्यवस्था के किन हिस्सों को हम पुनः प्रचलन में लाना चाहेंगे और कौन से ऐसे हिस्से हैं जिनको शायद हम छोड़ देना चाहेंगे? यदि हम गंभीरता से सोचें तो इनमें से किन चीज़ों को, जो हमसे इस समय छीन ली गई हैं, बहाल करने के लिए हम राजनैतिक एवं व्यक्तिगत इच्छा शक्ति का प्रयोग करेंगे - नागरिक अधिकार, समूह में इकठ्ठा होने की स्वतंत्रता, अपने शरीर के मनचाहे उपयोग की, समारोहों, आलिंगन व हाथ मिलाने की और समाजिक जीवन जीने की स्वतंत्रता। अपने जीवन में कई बार मुझे ऐसा लगा कि मानवता एक निर्णायक चौराहे के करीब है। हमेशा लगता था कि संकट, पतन और विनाश निश्चित हैं। ये कभी भी आ सकते हैं। लेकिन काफ़ी समय तक ऐसा नहीं हुआ।

मैं ये शब्द इसी उद्देश्य से लिख रहा हूँ कि मैं कुछ भ्रमित-सा और शायद थोड़ा डरा हुआ किन्तु फिर भी एक नई सम्भावना का भाव लिए आपके साथ इस स्थान पर खड़ा हूँ जहाँ से अनेक मार्ग निकलते हैं।

कोविड-19 के मरीजों की संख्या में अचानक आई बढ़ोतरी से चिकित्सीय व्यवस्था पर काफ़ी दबाव आ जाएगा, इसलिए सामाजिक दूरी के नियमों का पालन किया गया। मैं इसी तर्क को वृहत और दीर्घकालिक सन्दर्भ में रखना चाहूँगा। ऐसा न हो कि हम दूरी बनाने को अपनाकर इसी के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण करें। हमें पता होना चाहिए कि हम क्या चुन रहे हैं और क्यों? यही बात कोरोना वायरस महामारी के कारण होने वाले दूसरे परिवर्तनों पर भी लागू होती है। कुछ समालोचकों के अनुसार इसके कारण कितनी आसानी से समाज एक सर्वसत्तावादी नियंत्रण की ओर बढ़ रहा है। डरी हुई जनता नागरिक अधिकारों में कटौती को आसानी से स्वीकार कर लेती है जिन्हें अन्यथा उचित मानना कठिन होता है, जैसे कि प्रत्येक व्यक्ति की गतिविधियों पर लगातार नज़र रखना, जबरन स्वास्थ्य चिकित्सा, अनिच्छुक एकांतवास, यात्राओं पर नियंत्रण, कहीं एकत्रित होने की स्वंत्रता पर बंधन, उन सूचनाओं पर नियंत्रण जिन्हें शासन ग़लत मानता है, आदि। इनमें से कई कटौतियों पर कोविड-19 के पहले से ही विचार हो रहा था लेकिन इसके आने के बाद ये अनिवार्य हो गई हैं। यही बात व्यापारिक क्षेत्र के स्वचालन पर भी लागू होती है. जीवन का सार्वजनिक से व्यक्तिगत बनना, किसी पाठशाला में जाकर शिक्षा प्राप्त करने के बजाय ऑनलाइन शिक्षण प्राप्त करना, छोटी-छोटी ईंट-गारे से बनी दुकानों का कम होना और मनुष्य का काम और मनोरंजन दोनों के लिए कंप्यूटर, टीवी स्क्रीन पर निर्भर होना।

कोविड-19 पहले से ही मौजूद राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक रुझानों को और तीव्र कर रहा है। उपरोक्त सभी बातें सीमित अवधि के लिए इस आधार पर तर्कसंगत हैं कि वे महामारी के बढ़ते मामलों को कम करने में सहायक होंगी। पर हम इन दिनों नव-सामान्य के बारे में भी काफ़ी सुन रहे हैं जिसका अर्थ है कि शायद ये बदलाव अस्थाई न होकर आगे भी जारी रह सकते हैं। क्योंकि आतंकवाद के ख़तरे की तरह संक्रामक रोग का ख़तरा भी कभी जाता नहीं है।

नियंत्रण की मूलभूत प्रतिक्रिया

अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार कोविड19 से लगभग 5 लाख से ऊपर लोगों की मृत्यु हो चुकी है। खाद्य एवं कृषि संस्थान (FAO) के अनुसार पिछले वर्ष पूरे संसार में सोलह करोड़ बीस लाख अविकसित और पाँच करोड़ दस लाख दुर्बल बच्चों में से पचास लाख बच्चे भूख से मर गए। यह कोविड-19 से अब तक मरने वाले लोगों की संख्या से ज़्यादा है परन्तु फिर भी किसी सरकार ने आपातकाल की घोषणा नहीं की और न ही उन्हें बचाने के लिए हमें अपनी जीवनशैली को पूरी तरह बदलने को कहा। सिर्फ़ निराशा और अवसाद से विश्व में प्रतिवर्ष दस लाख और अमरीका में पचास हज़ार लोग आत्महत्या करते हैं – और यह एक बड़ी समस्या की झलक मात्र है। इसके अलावा नशीली दवाओं के अधिक मात्रा में सेवन से अमरीका में 70,000 लोग मरते हैं, प्रतिरक्षा सम्बन्धी महामारी 2 करोड़ 35 लाख (एन.आई.एच. के आँकड़े) से पाँच करोड़ (ए.ए.आर.डी.ए. के आँकड़े) लोगों को प्रभावित करती है। मोटापे से होने वाली बीमारियाँ दस करोड़ लोगों को प्रभावित करती हैं। इतना ही नहीं, हम परमाणु विश्वयुद्ध के विनाश को टालने के लिए विचलित दिखते हैं लेकिन फिर भी हम ऐसे विकल्प चुनते हैं जो इन ख़तरों को और बढ़ा देते हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि जब हमने बच्चों का भूख से मरना रोकने के लिए अपनी जीवनशैली नहीं बदली तो अब कोविड के लिए भी उसे बदलने की ज़रूरत नहीं है। बल्कि इसके विपरीत यदि हम कोविड19 के लिए इतना अधिक परिवर्तित हो सकते हैं तो अन्य परिस्थितियों के लिए भी तो हो सकते हैं। अपने आप से पूछें कि क्यों हम इस वायरस से निपटने के लिए तो सामूहिक रूप से एक साथ आ सके लेकिन मानवता के अन्य भयानक खतरों के मामले में ऐसा क्यों नहीं कर सके। अपने वर्तमान तौर तरीकों को लेकर समाज इतना जड़वत क्यों है?

इसका उत्तर आँखें खोल देने वाला है। वैश्विक भूख, नशे की लत, स्व-प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, आत्महत्या या पर्यावरण के विनाश के मामले में एक समाज के रूप में हम नहीं जानते कि हमें क्या करना चाहिए। हमारे आपदा नियोजन कार्यक्रम, जो सभी किसी न किसी तरह के नियंत्रण के ही स्वरूप हैं, इन परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रभावी नहीं हैं। अब एक संक्रामक महामारी की आपदा आने पर हम तुरंत सक्रिय हो गए हैं। यह ऐसी आपदा है जिसमें नियंत्रण कारगर है : क्वारंटाइन, लॉकडाउन, एकांतवास, हाथ धोना, घूमने पर नियंत्रण, सूचना पर नियंत्रण आदि। इनके कारण कोविड हमारे प्राथमिक डर का पात्र बन गया है। यह एक ऐसी परिस्थिति बन गया है जिसमें विश्वभर में हो रहे परिवर्तनों के सामने हमारे अंदर बेबसी की भावना बढ़ती जा रही है। कोविड-19 ऐसा ख़तरा है जिसके बारे में हम जानते हैं कि उसका सामना कैसे करें। अन्य बहुत से खतरों से भिन्न कोविड-19 एक योजना प्रस्तुत करता है।

हम कैसे संसार में रहना चाहेंगे?

सुरक्षा के नाम पर हम जीवन का कितना अंश त्यागना चाहते हैं? यदि यह हमें सुरक्षित रखता है तो क्या हम ऐसे संसार में रहना चाहेंगे जहाँ लोग कभी एकत्र नहीं होते? कोविड-19 तो एक दिन कम हो ही जाएगा पर इस संक्रामक रोग का भय तो हमेशा बना रहेगा। इसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया भविष्य के लिए राह निश्चित करेगी। सार्वजनिक जीवन, सामाजिक जीवन और शारीरिक निकटता का जीवन कई पीढ़ियों से कम होता जा रहा है। दुकान पर जाकर सामान ख़रीदने के बजाय हम सामान को घर पर मँगवा लेते हैं। बहुत सारे बच्चे बाहर जाकर खेलें, इसके बजाए आज डिजिटल रोमांचकारी खेल हैं। सार्वजनिक रूप से किसी स्थान पर मिलने के बदले हमारी ऑनलाइन मीटिंग्स होती हैं। किसी और महामारी के ख़तरे को टालने के लिए, क्या हम ऐसे समाज में जीना चाहेंगे जिसमें कभी कोई किसी से हाथ नहीं मिलाएगा, किसी को गले नहीं लगाएगा और न ही हाथ मिलाकर ताली बजाएगा? क्या हम ऐसे समाज में रहना चाहेंगे जिसमें हम कभी भी एकत्रित नहीं होंगे? क्या संगीत सभाएँ, खेल प्रतियोगिताएँ और त्यौहार अतीत की बातें हो जाएँगी? क्या बच्चे कभी आपस में नहीं खेलेंगे? क्या सारा मानवीय संपर्क कंप्यूटर और मास्क के माध्यम से ही होगा? क्या नृत्य कक्षाएँ, कराटे कक्षाएँ, कांफ्रेंस और चर्चसभाएँ नहीं होंगी? क्या मृत्यु दर में कमी ही प्रगति का मापक रह जाएगा? क्या मानवीय प्रगति का अर्थ अलगाव है? क्या यही भविष्य है? यही प्रश्न प्रशासनिक उपकरणों पर भी लागू होता है जो लोगों के भ्रमण और सूचना के प्रवाह पर नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इतिहास में पहली बार ऐसे तकनीकी माध्यम उपलब्ध हैं जो इस परिदृश्य को, कम से कम इन विकसित देशों में तो साकार कर ही सकते हैं। उदाहरण के लिए सामाजिक दूरी को लागू करने के लिए सेल फोन लोकेशन डाटा का उपयोग किया जाता है। इस उतार-चढ़ाव भरे परिवर्तन के बाद हम एक ऐसे समाज में रह सकते हैं जिसमें लगभग पूरा जीवन ऑनलाइन हो सकता है : शॉपिंग, सम्मलेन, मनोरंजन, सामाजिक मिलन, ऑफिस का

काम और यहाँ तक कि डेटिंग भी। क्या हम यही चाहते हैं? कितनी ज़िंदगियों को बचाकर हम इसे उचित ठहरा सकेंगे? हज़ारों, लाखों वर्षों के स्पर्श, संपर्क और एक साथ होने के बाद मानवीय प्रगति के उच्चतम शिखर पर क्या हम ऐसी गतिविधियाँ केवल इसलिए रोक देंगे क्योंकि उनमें ख़तरा है?

 समाज ही जीवन है

लगभग हर उच्च-मध्यम वर्ग के परिवार में सुरक्षा व्यवस्था उपकरण लगे होने के बाद भी लोग उतने ही चिंतित और असुरक्षित हैं जितने वे एक पीढ़ी पहले थे। चिकित्सा विज्ञान में अभूतपूर्वप्रगति के बावजूद गत तीस वर्षों में लोगों के स्वास्थ्य में गिरावट आई है क्योंकि दीर्घकालिक बीमारियाँ बढ़ गई हैं और जीवन सम्भावना की दर स्थिर हो गई है। अमरीका और ब्रिटेन में तो यह दर कम होने लगी है। इसी प्रकार, कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए जो उपाय लागू किए गए हैं, वे शायद कष्ट और मृत्यु को रोकने के बजाय अंततः और अधिक कष्ट और मृत्यु का कारण बन जाएँ। मृत्यु कम करने का अर्थ है उन मौतों को कम करना जिनका हम अनुमान लगा सकते हैं और जिन्हें गिन सकते हैं। ऐसी अतिरिक्त मौतों की गणना करना असंभव है जो शायद अकेले रहने के कारण होने वाले अवसाद या बेरोज़गारी के कारण आई निराशा या अत्यधिक भय के कारण घटी रोग-प्रतिरोधकता और ख़राब स्वास्थ्य से हों। ऐसा देखा गया है कि एकाकीपन और सामाजिक संपर्कों में कमी के कारण उत्तेजना, अवसाद और मनोविकार की सम्भावना बढ़ जाती है। लिसा रैंकिन, के अनुसार वायु प्रदूषण से मृत्यु का ख़तरा 6 प्रतिशत, मोटापे से 23 प्रतिशत, शराब के अत्यधिक सेवन से 37 प्रतिशत और एकाकीपन से 45 प्रतिशत बढ़ जाता है। कोविड-19 जैसी बीमारी में भी जिसमें हम एक रोगजनक वायरस को पहचान सकते हैं, मामला इतना सरल नहीं है क्योंकि रोगी वायरस से जूझ रहा होता है और उसकी हालत गंभीर होती है। ‘जर्म थ्योरी ऑफ़ डिज़ीज़’ अर्थात् बिमारियों के लिए कीटाणु सम्बन्धी सिद्धांत का एक दूसरा विकल्प है जिसमें कीटाणुओं को एक ज़्यादा बड़ी प्रक्रिया का अंश माना जाता है। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं तो वे शरीर में काफ़ी संख्या में बढ़ जाते हैं जिससे कभी-कभी व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती है। लेकिन साथ ही जिस परिस्थिति ने उसे बढ़ने में सहायता दी थी उसमें सुधार भी करते हैं, उदाहरणार्थ बलगम के उत्सर्जन द्वारा एकत्रित विषैले अवशेषों को साफ़ करना या उन्हें बुखार के ताप से जला देना। कभी-कभी इसे ‘टेरेन थ्योरी’ अर्थात् क्षेत्र सम्बन्धी सिद्धांत कहा जाता है जिसके अनुसार कीटाणु बीमारी के कारण से ज़्यादा उसका लक्षण हैं। जैसा कि एक ज्ञापन इस प्रकार समझाएगा : आपकी मछली बीमार है। ‘जर्म थ्योरी’ कहती है कि उसे अकेला कर दो। ‘टेरेन थ्योरी’ कहती है कि टैंक साफ़ करो।... मैंने स्व-प्रतिरक्षा, मोटापे आदि को लेकर जो आँकड़े पहले दिए थे वे बताते हैं कि अमरीका और आधुनिक संसार के लोग एक स्वास्थ्य संकट से गुज़र रहे हैं। क्या इसका समाधान यह है कि जो कुछ हम करते रहे हैं उसे ही और अधिक गहराई से करें? अभी तक कोविड के प्रति प्रतिक्रिया तो यही रही है कि परंपरागत तरीकों का ज़्यादा दृढ़ता से पालन करना और अपरम्परागत तरीकों एवं विपरीत मतों को दरकिनार करना। दूसरी प्रतिक्रिया यह हो सकती है कि हम अपना दृष्टिकोण व्यापक बनाएँ और पूरी व्यवस्था का अध्ययन करें। इस अध्ययन में, इसका भुगतान कौन करता है, अनुदान कैसे प्रदान किया जाता और शोध के लिए धन कैसे उपलब्ध करवाया जाता है, जैसे विषय ही शामिल नहीं हों बल्कि वनस्पति औषधि, क्रियात्मक औषधि और ऊर्जा सम्बन्धी औषधि जैसे अन्य विषयों को भी शामिल किया जाए। इन पर आज विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। शायद हम इस अवसर का उपयोग

बीमारी, स्वास्थ्य और शरीर सम्बन्धीप्रचलित सिद्धांतों का पुनर्मूल्याँकन करने के लिए कर सकते हैं। जी हाँ, इस समय तो हम बीमार मछली को बचाने की यथासंभव कोशिश करें पर अगली बार अगर हम टैंक को साफ़ कर सकें तो शायद हमें मछली को अकेला नहीं रखना पड़ेगा और इतनी मछलियों को औषधि नहीं देनी पड़ेगी।

राज्याभिषेक

क्या हम सिर्फ़ अपनी जीवनरक्षा सुनिश्चित करने वाले बनेंगे या फिर हम मददगार बनेंगे? जीवन आखिर किस लिए है? बड़े पैमाने पर देखें तो अब लोग उन प्रश्नों को उठा रहे हैं जो अब तक सक्रिय कार्यकर्ताओं तक ही सीमित थे। बेघरों के लिए हमें क्या करना चाहिए? पिछड़े देशों की गंदी बस्तियों के लिए हमें क्या करना चाहिए? बेरोज़गारों के लिए हम क्या करें? होटल की सेविकाओं, ऊबर के ड्राइवरों, नलसाज़ों, चौकीदारों, बस चालकों, कोषपालों (cashiers) का क्या होगा जो घर से कार्य नहीं कर सकते? इसलिए अंतत: अब छात्र ऋण में छूट और सामान्य न्यूनतम आय (Universal Basic Income) के विचार उभर रहे हैं। हम उन व्यक्तियों की सुरक्षा कैसे करें जो कोविड19 से आसानी से ग्रसित हो सकते हैं?” यह प्रश्न हमें यह सोचने पर विवश करता है कि, “हम सामान्य तौर पर निर्बल व्यक्तियों की देखभाल कैसे करें?” यह एक भाव हमें मथता रहता है चाहे कोविड की गंभीरता, उत्पत्ति या इससे निपटने के सर्वश्रेष्ठ तरीक़े के बारे में हमारी जो भी धारणा हो। यह हमें कह रहा है कि हम एक-दूसरे की देखभाल के प्रति कटिबद्ध हो जाएँ। याद रखें कि हम सब कितने अनमोल हैं और जीवन कितना अनमोल है। हम अपनी सभ्यता को जाँचें-परखें, इसके प्रत्येक पहलू का बारीकी से विश्लेषण करें और देखें कि क्या हम इससे ज़्यादा खूबसूरत सभ्यता की रचना कर सकते हैं? जैसे-जैसे कोविड हमारी सहानुभूति की भावना को झकझोर रहा है हममें से ज़्यादा से ज़्यादा लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि हमें फिर से पहले की तरह सहानुभूति विहीन ‘सामान्य’ जीवन में नहीं जाना है। अब हमारे पास अवसर है कि हम एक नया और अधिक सहानुभूतिपूर्णसामान्य’ जीवन बनाएँ। ऐसा होने के भरपूर आशाजनक चिन्ह दिखाई भी दे रहे हैं।

सारे संसार से हम उपचार और एकजुटता की कहानियाँ सुन रहे हैं। मेरे एक मित्र अनु खान और नितिन राणा ने लगातार 55 दिनों से गरीबों के लिए सुबह शाम के खाने के प्रबंधन कर रहे हैं और उनके घर-घर जाकर खाना पहुंचा रहे हैं ; मजदूर भाइयों  को  बसों से  मीडिया में बिना हल्ला किये, सरकार के साथ मिलकर उनको एक राज्य से दूसरे राज्य पहुंचने का काम कर रहे है। फिल्म अभिनेता सोनू सूद ने बसों से मजदूरों को भेज कर सराहनीय काम किये है। डॉक्टर, नर्सें पुलिस और मीडिया कर्मी  आवश्यक सेवा से जुड़े कई कर्मचारी अपना जीवन संकट में डालकर जनता की सेवा कर रहे हैं। रेबेका सोलनिट ने अपनी शानदार पुस्तक पैराडाइस बिल्ट इन हेल (नरक में बना स्वर्ग) में बताया है कि विपत्ति अक्सर एकजुटता को जन्म देती है।

एक व्यक्ति या समाज के रूप में इन अलग-अलग रास्तों पर हमारा मार्गदर्शन कैसे हो सकता है? रास्ते के प्रत्येक मोड़ पर हम यह जान सकते हैं कि हम किस का अनुसरण कर रहे हैं - भय का या प्रेम का, आत्म-सुरक्षा का या उदारता का। क्या हम भयभीत बने रहकर एक भय आधारित समाज की रचना करेंगे? क्या हम सिर्फ़ अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जीएँगे? क्या हम संकट का उपयोग अपने राजनैतिक शत्रुओं के विरुद्ध हथियार की तरह करेंगे? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर या तो पूर्ण है या फिर बिल्कुल नहीं - पूर्ण प्रेम या पूर्ण भय। इसका मतलब है कि प्रेम का मार्ग हमारे सामने है जिसपर हमें अगला कदम उठाना है। यह साहसपूर्ण कार्य है लेकिन अविचारी नहीं। यह मृत्यु को स्वीकार करते हुए जीवन को संजोना है। नशे की लत, अवसाद और अनेक शारीरिक बीमारियों के साथ-साथ भय भी अलगाव और मानसिक आघात की ज़मीन में पनपता है।

वायरस विकास का अविभाज्य हिस्सा है। यह सिर्फ़ मानव के लिए ही नहीं बल्कि सभी सुकेन्द्रिक (जीव जिसकी कोशिकाओं में केन्द्रक होता है, जिसके अन्दर डी.एन.ए. होता है) जीवों के लिए लागू होता है। वायरस एक जीव से दूसरे जीव में डी.एन.ए. को स्थानांतरित कर सकते हैं। कभी-कभी वे डी.एन.ए. को

जर्म-लाइन (जनन-रेखा) में सम्मिलित कर देते हैं (तब यह आनुवंशिक हो जाता है)। इसे ‘क्षैतिज जीन-स्थानांतरण’ (horizontal gene transfer) कहते हैं और यह विकास की प्राथमिक प्रक्रिया है। इससे जीवन का विकास सांयोगिक उत्परिवर्तन (random mutation) की तुलना में अधिक तीव्र होता है। जैसा कि लिन मार्गुलिस ने एक बार कहा था कि, “हम खुद अपने वायरस हैं।

अब प्रश्न उठता है कि यह किस चीज़ का आरम्भ है? इस आरम्भ की प्रकृति और उद्देश्य क्या है? इस महामारी के प्रचलित नाम में इसका संकेत छुपा है - कोरोना वायरस। अंग्रेज़ी में कोरोना का अर्थ होता है- राजमुकुट। नोवेल कोरोना वायरस अर्थात् सबके लिए नव राज्याभिषेक।

सुजीत कुमार चौबे

Comments

  1. Friends your comments are welcome !

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  2. Sorry, friends to let you know that the data given in blog is till 24th May 2020. I am new to this blog approach so, learning at one side and eagerness is at zenith at the other side. I am not able to edit it...

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  3. Loved to read the post, very well written and informative too.
    Keep writing. All The Best

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  4. A 100% true observation. World has seen a shift and people have forcefully changed their lifestyle. But, this pandemic has really given us a realisation opportunity to differentiate between needful and unnecessary demands of life.

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  5. Really liked the way you have thing on the current situation...Very much impressed..Keep writing

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  6. Well Written. Metamorphosis in Lifestyle and it's adoption. Disrupted World. I like the content very much!!
    Keep Writing!!

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  7. Very well drafted, keep writing. Really its revolution of new way of lifestyle.

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    1. I would have loved to thank you by you name .. 😊 Anyway... I mean your comments. Thank you !!

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  8. जबरजस्त आलेख , विषय-वस्तु बहुत ही समसामयिक व् सार्थक है और आलेख के पीछे की मनसा तो बहुत ही उच्च कोटि की है। डाटा तो आने वाले समय के साथ बदलता रहेगा लेकिन आपके द्वारा उठाया गया विषय सदा - सर्वदा मानव हित के लिए आयोजित यज्ञ में आहुति का कार्य करेगा। आलेख का अंतिम लघु वाक्यखण्ड प्रश्नों के साथ शुरू हो रहा है यह पाठक के लिए थोड़ी सी विषम परिस्थिति पैदा कर रहा है क्योकि इतना विस्तृत आलेख पढ़ने के बाद पाठक अपने स्वाभाव के अनुरूप संस्तुति की उम्मीद कर बैठता है। धन्यवाद .

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    1. आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ लेकिन उधेड़बुन के साथ साथ, समाज के लिये एक साथ हम सबको आने की अपील भी है ... बहुत बहुत धन्यवाद हौसला अफजाई के लिए .. साभार !

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  9. बहुत बढिया लेख।
    डगर कठिन है, रास्तों पर कांटें हैं, इन्हें गुलाब कहने भर से सफर नहीं कट सकता, काँटों को काँटा कहते हुए ही उनसे बचने की जुगत लगायी जा सकती है। हम जीतेंगे यह भी तय है लेकिन हमे यह रास्ता मिलकर ही तय करना है।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद् मयंक .... आपसे सहमत हूँ

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  10. कॅरोना महामारी के संदर्भ में आपने आधुनिक सभ्यता के कुछ वैसे अनछुए पहलुओं को छुआ है जिनपे गहराई से आत्ममंथन की जरूरत है। कॅरोना और उसके संबंध में विश्व भर की सरकारी प्रतिक्रियाये केवल आपदा प्रबंधन नही लगती। कॅरोना एक आरोपित रहस्य लगता है और सामाजिक और वैज्ञानिक दोंनो रूपों से एक एकरूप विश्व व्यवस्था को सबपे थोपने का प्रयास भी।

    बात होनी चाहिए, सरकारे क्या लोगों को जिंदगी जीना सिखाएंगी, हाथ मिलाना, गले लगाना, क्या सब अब सरकार से इजाजत लेके किया जायेगा। और जो सरकार को करना है वो कौन करेगा?

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  11. अनछुए पहलुओं को छूने के लिए, सारगर्भित सूचनाओं से भरे आपके इस सार्थक प्रयास को साधुवाद देता हूँ।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद रमेश। पूरी तरह सहमत हूँ आपसे।

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  12. Very well written...My best compliments.

    I second the concern for a constructive and inclusive society. Every crisis comes with myriads opportunities. As rightly pointed by you, we need to revisit our social construct and redefine ourselves as a society. Also, you have very aptly pointed out the drastic change this Pandemic has brought in the relationship between Government and its people. Hopefully, you would continue giving us such thoughtful stuffs.

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    1. I will try to have a place in the hearts of the lovely readers whose comments, I respect that infuses new spirit in to me for moving forward in this journey!
      Thanks a lot Mukesh !

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  13. आपके ब्लॉग एवम् प्रथम आलेख के लिए बधाई। प्रस्तुत आलेख आपके अंदर के विचार मंथन एवम् भावों को बखूबी शब्दों में पिरो लाने मे सफल रहा है। वस्तुतः, यह मंथन समूचे समाज का मंथन है। कोरोना संकट हमारे तेज़ रफ्तार जीवन-शैली को नियंत्रित करने हेतु एक विशाल 'रिसेट बटन' की तरह है जिसे प्रकृति ने मानो हमारे लिए दबा के छोड़ दिया हो। निश्चित हीं 'पोस्ट-कोरोना सोसाइटी' अब वो समाज नही रहेगा, जिसे जीने की हमे लत पड़ गई थी। आशा है कि इन बदलते सामाजिक प्रतिमानों पर भी आप जैसे लेखक-विचारकों की सूक्ष्म दृष्टी बनी रहेगी। आपकी लेखनी-धारा यूँ हीं अविरल बहती रहे...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद कृष्णा जी।

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  14. रोचक, मार्गदर्शक एवम् कय सारगर्भित प्रशनो को अपनी गोद में छुपाए हुए समाज और व्यक्ति की ओर आशान्वित प्रश्नवाचक नजरों से निहारता आलेख ।
    बहुत सुंदर सुजीत जी । बधाई ।

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    1. संजय चौधरी

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    2. बहुत बहुत धन्यवाद सर !

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  15. thanks for providing this opportunity to read your Blog bhaiya, I have acquired so many new things and also new thoughts conveyed by you..... I am truly inspired by this blog, hope you will inspire alot by your blog's in near future.

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    1. Thanks a lot, Kavita for your encouraging words !

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  16. Thanks Sujeet for touching something which was actually not asehaj, really liked the way you have drawn the attention. Would love to see more such stuff from you, all the best!

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